Thursday, April 14, 2011

कुहुकेला धीया के करेजवा




कुहुकेला धीया के करेजवा , त आंखिया से लोरवा झड़े ए राम.

होत  भिनुसार  विदईया   में ,   सखिया सहेलिया   रोए    ए राम.


डोलिया दुअरिया लगईले कहारअ , पापी   ठाड़े   भईले ए राम.
सुसुकेली माई के गोदीया में , तनी ना अचरवा  छोड़े ए राम.

छुटल जाला   घर  नईहरवा , सहेलि या के संगवा छोहे ए राम.
याद पड़े भाई के दुलरवा आ , बाबूजी के नेहिया साले ए राम.

सुसुकत   डोली    में बईठे बहुरिया , कहरवा उठाई लेलस ए राम.
“आशावादी” लिखत में लोड़ झडे, हाथ से कलमिया रुके ए राम .



“श्रीनाथ आशावादी”


आकाशवाणी पटना से रमेश्वर गोप द्वारा प्रसारित एवं दैनिक हिंदुस्तान पत्र की समीक्षा में प्रसंशित






Wednesday, April 13, 2011

छोटहन सा बचवा सयान हो जाला





दो चार आखर पढके बेईमान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


लईकन के बचपन में एने ओने भागल.
तोतली आवाज इनके बड़ा नीक लागल.
उहे जवानी में नीम के जुबान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


बचवा  के   मन    में    रहे  ना एको पाप.
सपनों में गलती से कहे ना झूठो साच.
उहे  बढ़ला   पे झूठ के गतान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


लईका आउर   लईकी  के बचपन के साथ.
खेतवा में खेले कूदे डाल के हाथों में हाथ.
उहे  जवानी   में   छुवे त बदनाम हो जाला.
आ   छोटहन   सा    बचवा सयान हो जाला.


तुरंते        लड़े     आउर     तुरंते मान जावे.
भागे    लड़ाई     करे     फेनु      लगे    आवे.
उहे बढला पर बड़का अभिमान हो जाला.
आ छोटहन    सा   बचवा सयान हो जाला.


माँई बाबू से प्यार करे , करे परनाम .
अब देखीं दूर से हीं कईसे करे सलाम .
कि घरवा में जईसे मेहमान हो जाला .
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


जाति     आ     पाति     के बात ना माने.
धरम का   ह    देश का ह बात ना जाने.
बड़का में लोभ द्वेष के दोकान हो जाला.
आ छोटहन    सा    बचवा सयान हो जाला.


लईकन के प्रेम के धागा से लोग बांधल .
कि देवतो भी इनके पवित्रता के कायल .
उहे जवानी में झूठ के खदान हो जाला .
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


दो चार आखर पढके बेईमान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.



अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Saturday, April 9, 2011

ये पैसा हाय





















पैसे   के    पीछे     तू खुद     को इतना क्यूँ भगाए .

इस     पैसे      ने   देखो तुझको कैसे दिन दिखाए .


गद्दे    मखमली     घर    तेरे    पर  नींद तुझे सताए
नेट-मोबाइल   हाथों    में पर  , दोस्त नहीं घर आए.

बना  लिए   घर   इतने सारे , और कितने मकान.
पर    रहते     इनमे   तुम ऐसे , जैसे एक मेहमान .


फ्रिज    टी.   वी.     कार     आदि ,  भोगे सारे सुख .
लुटा    दिए    तुमने      सारे ,    इनपे पेट की भूख .


म्यूजिक सिस्टम अनगिनत पर गीत नहीं हैं भाते .
ह्रदय रोग    डाईबीटीज     आदि     तुम्हें बहुत सताते .


तेरे पैसे से    आते     मेवा   पर खाते नौकर चाकर .
और तुझे    टेबलेट    ईन्जेक्सन देते डाक्टर आकर .


तेरा   जीवन    उत्पीड़न चिंता ,गम दुःख और हाय.
बेनाम   हितैषी     तेरा     तुझको , सुझा    रहा उपाय .


ये पैसा हीं इनके पीछे , ये सब इसका हीं है काम,
हर लूँ तेरे दुःख सारे कि मुझको दे दो पैसे तमाम .




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी














Friday, April 8, 2011

विधवा के चिठ्ठी



















दुखवा के    बतिया,     लिखत    बानी पतिया में,

लोरवा        गिरेला    दिन     रतिया        सहेलिया.
लगन देखि शादी भईल,पोथियो भी झूठ भईल,
धूल     में        सोहाग     मिल गईल रे सहेलिया.


मईलअ    कुचईल   जबअ , कपड़ा पहिनी जबअ,
लोग     कहे        हमरा         के फूहड़ रे सहेलिया.
साफ      सुथड      जब रहीं , लोग हँसें कही कही,
ई     त        अब       मन के   बिगडलस सहेलिया.


घर     आ       बहरवा       के , बिगडल लोगवा के,
बुरा       बाटे        हम        पे     निगहवा सहेलिया.
दुनिया     के रीति नीति , देखि देखि हम सोची,
मन       के       लगाम      टूटी    जाई रे सहेलिया.


गोतीनि-देयादिनी      के ,     अपना पिया के संगे,
देखि      जिया       ह्हरेला          हमरो      सहेलिया.
मन     के        पियास       जब , हमके सतावे तब,
कईसहूँ       ईज्जतअ         बचाइं         रे सहेलिया.


लाजवा    के बतिया हम, लिखी कईसे पतिया में,
दुनिया    के        मरमो       , ना   जननी सहेलिया.
जिनगी     के   आपन पोल , केतना दी हम खोल,
घर     में       कुतियो       के  ना मोल रे सहेलिया.


गोदवा     में      रहिते      जे , एकोगो बालकवा त,
ओकरे      में          मन        अझूरईती      सहेलिया.
बाकिर गोद बाटे सुनअ, सोची सोची सूखे खूनअ,
जिनगी       में       खाली    बा अन्हारे रे सहेलिया.


कुहुकी      कुहुकी      चिडई , पिंजरा   में जीयतारी,
व्याध     ई        समाज       गोली मारे रे सहेलिया.
पतिया       के       बात      माँई      से जनी कहिअ,
कही      दीहअ       बेटी       नीक बाटी रे सहेलिया.


अंखिया     के      लोरवा    त , लेपलस अक्षरवा के,
धीरज     धके       टोई       टोई ,     पडीह सहेलिया.
“श्रीनाथ आशावादी”       लिखत      में     लोर झरे,
विधवा       के      दरदअ       सुनावे      रे सहेलिया.



“श्रीनाथ आशावादी”

Monday, April 4, 2011

शहर और देहात

ले आये डिग्री बहुत तुम पढ़ लिखकर.

हम गावों में पलते रहे निरा अनपढ़ .

बने कहाँ इंसान कोई हमसे बेहतर .
है कोई हममें तुझमे मौलिक अंतर .

हम झगड़ा करते मकई और मचानों पे .
और तुम्हारी फ्रिज टी.वी. समानों पे .


हम लड़ते आपस में आपस में सुलझाते .
तुम एग्रीमेंट करते मेडीएसन अपनाते .


हमारे बदन पे कपड़े नहीं कि पैसे कम हैं .
तुम खरीदते कपड़े वही कि दिखे बदन है .

हमारी भूख हमारी सबसे बड़ी बीमारी है .
तुम्हे भूख नहीं लगने कि चिंता जारी है .


हम काम बहुत करते कि नींद बहुत सताती है .
आराम बहुत करते तुम नींद कहाँ फिर आती है .


गावों में पानी से परेशां , बाढ़ बहुत आती है .
शहरों एक बूंद भी , सुना है बहुत लुभाती है .


आई लव यू कहने से प्यार तुम्हार बढ़ नहीं जाता .
और हमारा प्यार तो जाने बस नयनों की भाषा .

उम्र हमारी खपती सारी एक मकान बनानें में .
और तुम्हारी अनगिनत सजाकर गार्ड बचानें में .

गुस्से की बात कहते हम गाली देकर .
और तुम झुंझलाते अंग्रेजी में कहकर .

अंतिम यात्रा में तुम्हे भी कन्धों का मिलता साथ .
मरते हम भी और होती बिदाई अपनों के हाथ .


अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी





Friday, April 1, 2011

हाए रे दुनिया, हाए रे मानव , हाए रे भारत की धरती.

इस दहेज ज्वाला में कितनी सीताएँ जलती रहतीं .
हाए रे दुनिया, हाए रे मानव , हाए रे भारत की धरती.

बेटी वाला मांग करे तो बेटी बेचवा कहते हो .
पर बेटे जो बेचा करते , मान-प्रतिष्ठा देते हो .
विपरीत धार में पता नहीं क्यों , गंगाजी हैं बहती .
हाए रे दुनिया, हाए रे मानव , हाए रे भारत की धरती.


कागज के नोटों आदि से कहाँ किसी का मन भरता है .
ईख पेर कर रस चुसता जो , जैसे ही वो करता है .
एक नहीं लाखों सीताएँ घुट घुट कर मरा करती .
हाए रे दुनिया, हाए रे मानव , हाए रे भारत की धरती.

पोथी गणना और लग्न से सज धज शादी होती है .
गणपति शिवजी देवगान से कन्या पूजित होती है .
देव न कोई रक्षा करता , बहुएँ हैं जलती रहती .
हाए रे दुनिया, हाए रे मानव , हाए रे भारत की धरती.


राजा राममोहन की धरा पे , यूँ बहुएँ हैं जलती क्यों .
दुःख की बदली नित इनकी आँखों में छाई रहती क्यों .
उस समय जलती थी विधवा , इस समय सधवा जलती .
हाए रे दुनिया, हाए रे मानव , हाए रे भारत की धरती.


ओ भाई ओ बहन माताओं , आओ नूतन रह अपनाएँ.
“श्रीनाथ आशावादी” कहते , घर घर में अलख जगाएँ.
सामाजोध्हार संघ चीख रहा है , क्यों बहनें घुटती रहती .
हाए रे दुनिया, हाए रे मानव , हाए रे भारत की धरती.



“श्रीनाथ आशावादी”

Tuesday, March 29, 2011

तिलक सबके हरान करता





























शेर: नाच बाजा फैशन वाली शादी बरबाद करे .

लईका लईकी दुनू के घर के नाश करे .
“आशावादी” कहे एलान रउआ सुन लीं .
सामाजोध्हार संघ ई कुपरथा के विनाश करे.


गीत: सामाजोध्हार संघ सगरो एलान करता .
तिलक दान दहेज सबके हरान करता .

कईसन सुंदर चीज ह शादी , तिलक कर देता बर्बादी .
जबरन दान दहेज वसुलाला, पईसा पानी में बह जला .
लईकी वाला के तिलकअ परेशान करता .
तिलक दान दहेज सबके हरान करता .

आदमी केतनो होखे खोटा , शादी रुपिये से तय होता .
तिलक बन गईल बा शान , जाता लईकी सन के जान .
नाच बाजा वाली शदिया नुकसान करता .
तिलक दान दहेज सबके हरान करता .


शदिया के अवसर आवे , लईकी वाला रोवे गावे .
बाकि सब कुछ उ भूल जाला ,लईका वाला जब हो जाला.
उहे लईका के शादी में गुमान करता .
तिलक दान दहेज सबके हरान करता .


“आशावादी” कहे गाई , तनी सोचअ बहिन भाई
घर घर कर तू परचार , तिलक रही न आधार .
कि तिलक बनके शैतान , परेशान करता .
तिलक दान दहेज सबके हरान करता .


श्रीनाथ आशावादी


Friday, March 25, 2011

बुजुर्गों की होली

















बुजुर्गों     के      संग

धुले मन का उमंग .
खेलो     होली    ऐसे
जैसे    कोई सत्संग .


जैसे    कोई       सत्संग
कि अबीर ही है आस.
डालो   संभल   के जरा
दुःख    रही     है नाक.


दुःख       रही      है   नाक
कि    करो     बस   प्रणाम .
रंग को    तो    दूर से ही
राम राम भाई राम राम .




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Thursday, March 24, 2011

जवानों की होली






















जवानों      के     संग

मचे   मस्ती   का रंग
धर      पकड़     यहाँ
वहाँ      भी     हुरदंग


वहाँ   भी   हुरदंग   है
जवानों   की     आग
पानी   पड़े ज्यों ज्यों
ये बढ़ती जाती प्यास


बढ़ती  जाती   प्यास
कि जवानों   के संग
डालो   रंग   गोरी के
पकड़    अंग    अंग




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Wednesday, March 23, 2011

बच्चों की होली

                                             
बच्चों के संग

होली एक जंग
देखो बचे कोई नहीं
बिन खेले रंग .

दौड़े धूपे बच्चे सब
फेकें पिचकारी
और बच्चों के आगे
तो चाची भी हारी .


चाची भी हारी कि
जोश है खरोश है
नटखटपन पे बच्चों के
जमाना मदहोश है .




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी