Monday, November 7, 2011

मौन व्रत


नहीं धारण कर सकता मौन व्रत मैं
सोमवार से शनिवार तक
ऑफिस में 
रोजी का सवाल है

और

रविवार को घर पे
दिनभर
रोटी का जंजाल है  


अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी



स्त्री और पुरुष

















 

दो भिन्न प्रजाति
भिन्न शरीर
भिन्न भाव
भिन्न भाषा
भिन्न आशा
भिन्न अभिलाषा

कहते नहीं मन की बात.
समझते नहीं अनकही बात  

फिर भी
साथ रहे बिना रह नहीं सकते

और
साथ लड़े बिना चल नहीं सकते


कुत्ते और बिल्ली सा है
संबंध  
स्त्री और पुरुष का


अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Monday, October 31, 2011

मैं अनेक हूँ



 





सड़क पे एक्सीडेन्ट में लोगो को मरते देख
डरने वाला आदमी ,

ऑफिस में लेट पहुँचने के डर से
सड़क पे सरपट दौड़ लगाने वाला आदमी .

ऑफिस में अपने से छोटे स्टाफ को
झूठ बोलने पे गाँधी का लेक्चर देने वाला आदमी ,
और घर पे पडोसी को एवोइड करने के लिए
बेटे से झूठ कहलवाने वाला आदमी .

बेटे को टी वी से चिपक कर क्रिकेट देखने पे
जोर से डपटने वाला आदमी ,
और ऑफिस से लौटते वक्त एक दुकान के सामने खड़े हो
मिनटों क्रिकेट का लुत्फ़ उठाने वाला आदमी .

कोर्ट में क्लर्क के एक्स्ट्रा पैसे मांगने पे
झुंझलाने वाला आदमी ,
और रोड पे एक का सिक्का मिलने पे
चुपचाप जेब में रखने वाला आदमी .

सुबह जल्दी उठने का निश्चय कर
रात को जल्दी सोने वाला आदमी ,
और सुबह थोड़ा और थोड़ा और कर
देर से उठकर झुंझलाने वाला आदमी .

मैं अनेक हूँ .



अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Saturday, October 8, 2011

सरल होने का प्रतिफल
















एक भैंस
जन्म लेती है
घास खाती है  
दूध देती है
दही देती है
घी देती है

वो झूठ नहीं बोल सकती
वो निंदा नहीं कर सकती
किसी का उपहास नहीं कर सकती

इसलिए बच्चे जनती है नि-स्वार्थ
ताकि आदमी को
दूध मिल सके
दही मिल सके
घी मिल सके

अंत में बूढी हो
चढ़ जाती है किसी कसाई के हाथ

क्योंकि भैंस कपटी नहीं होती
आदमी की तरह  
निज स्वार्थ साध नहीं सकती

अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Wednesday, September 14, 2011

सौगात




मेरी जिंदगी मुझे यूंही तुमसे मोहब्बत नहीं है .
तेरी हर एक नई सुबह , मौत पे हुकुमत का एहसास कराती है .



अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी


Monday, May 30, 2011

ज्ञान चक्षु



जो देखता है आदमी

वो बन जाता है आदमी.


क्योंकि आदमी जो देखता है
आदमी वो सोचता है.


आदमी जो सोचता है
आदमी वो बोलता है.


आदमी जो बोलता है
आदमी वो करता है.

और आदमी जो करता है
वो ही आदमी बन जाता है.


गर आँखें विकार संपोषक
विकसित हो अनगिनत द्वन्द.

सरल जीवन का मंत्र मूल एक
ज्ञान चक्षु - दर्शन होशमंद.




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Monday, May 16, 2011

प्रभु दर्शन




















इन आँखों का दर्शन कैसा

देह अगन नयनों पे भारी.
इन कानों का श्रवण कैसा
मनोरंजन  कानों    पे हावी.

चरण   स्पर्श करूँ मैं कैसे
वसनयुक्त   कर  स्पन्दन.
इर्ष्याग्रस्त है मेरी जिह्वा
कैसे   करूं    मैं प्रभु नमन.

तेरे    वास     को     पहचानू   मैं
नहीं घ्राण मेरी ऐसी विकसित.
चाह    अनंत    मन   भागे पीछे
बोध   दोष    व्यसनों से ग्रसित.

राह   मेरा   पर  बाधा प्रभु
मन का रचा हुआ संसार.
पथिक मैं और मंजिल तू
जाऊं   कैसे   मन    के पार.

मन   मेरा    संसार   प्रक्षेपित
नमन,कथन,वचन अस्वस्थ.
चाह “बेनाम” दर्शन हो तेरा
प्रभु   बिन    इन्द्रिय     अस्त्र.


अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी









Monday, May 2, 2011

अस्तित्व ईश्वर का



हमारा अस्तित्व

ईश्वर के अस्तित्व से
कोई अस्तित्व नहीं रखता
क्योंकि
ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं होता
बल्कि
अस्तित्व ही ईश्वर है.



अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Saturday, April 30, 2011

हद




लोगों की नासमझी का उठाने भी दो फायदा,

 “बेनाम” शराफत जताने की भी हद है .


वो नाराज हैं कि आसमाँ से तोड़ा नहीं चाँद को,
समझा दे कोई आशिकी निभाने की भी हद है ,


तेरे कहने से पी तो लूँ, पर बहकने की हद तक ,
बता दे कोई दोस्ती बनाने की भी हद है .


कहने से डरता हूँ मैं , चुप रहकर मरता हूँ मैं
मोहब्बत में इस कदर , फसाने की भी हद है .


ये आपका ही प्यार है कि जिन्दा मैं अबतलक
अब मर के यूं ईश्क को बताने की भी हद है


छत की जद्दोह्द में , कब्र तो नसीब की
खुदा तेरा यूं रहमत बरसाने की भी हद है


अजय अमिताभ सुमन

उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Thursday, April 28, 2011

फूल से दुल्हिनियाँ अंगार बन जईहें



शेर : नारी जब सिंगार करे त फूल भी लजा जाला

नारी जब कठोर बने त पत्थर भी शरमा जाला
“आशावादी” कहे कि नारिये से युद्ध में
बड़े बड़े वीरन के पांव डगमगा जाला


गीत: जिनगी सवाँरेला अधिकार लेके रहिहें
फूल से दुल्हिनियाँ अंगार बन जईहें

मोम से मुलायम हई , पत्थर से कठोर हो
केहू खातिर अमृत हई, केहू खातिर जहर हो
बिगड़ल दुनिया ला ई माहूर बन जईहें
फूल से दुल्हिनियाँ अंगार बन जईहें


झाँसी के रानी के ई जान ताटे दुनिया
शान तुडली दुश्मन के मान ताटे दुनिया
झाँसी के रानी के अवतार बन जईहें
फूल से दुल्हिनियाँ अंगार बन जईहें


जगिहें बहिनियाँ त बड़ा उपकार होई
सचमुच में देश के आ घर के उद्धार होई
जे “आशावादी” के ई रहिया पे चलिहें
फूल से दुल्हिनियाँ अंगार बन जईहें




“श्रीनाथ आशावादी”