Friday, March 25, 2011
Thursday, March 24, 2011
Wednesday, March 23, 2011
Tuesday, March 22, 2011
Friday, March 18, 2011
उड़ान
चूल्हा चौकी व बरतन थाली
रोटी चावल औ चाय की प्याली.
बचपन का बदलो रुख थोड़ा
दे दो इनसे इन्हें आज़ादी.
बेटी का मतलब कुछ समझो
नहीं ध्येय बस इनकी शादी.
ला बैठा रख दो घर में कि
इनसे बढ़ती रहे आबादी.
पर इनके न कतरो ऐसे
खुले गगन को है पर आतूर
तोड़ समाज के पिंजर बंधन
नाप अम्बर लेने को व्याकुल.
खुदा नहीं करता कोई अंतर
भेद भाव मत होने दो.
बेटा बेटी हैं एक बराबर
उड़ान इन्हें भी भडने दो.
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारीWednesday, March 16, 2011
दहेज के दानव
मैं एक बूढा हूँ रंजो गम का दामन हर दम सहता हूँ .
किसी के घर ना हो बेटी यही मौला से कहता हूँ .
मेरा आँगन था सुना पड़ा मुद्दत से उदासी थी
थी सुबह हर बंजर मेरी हर शाम बासी थी .
बड़ी मिन्नतें की घर में मैंने उजाले के वास्ते .
पीर , बाबा को गया , मौला के रास्ते .
बड़ी ख्वाहिशों के बाद मेरी बगिया भी चहकी थी .
खुदा तुमने बूढ़े के दामन में औलाद बख्शी थी .
हर सुबह की किरण नई पैगाम लाती थी .
मेरी बेटी आँगन में जब खिलखिलाती थी .
खुदा मेरे मुझे इस बात का बड़ा अफ़सोस था .
मेरी डाट से डरती थी इस बात का रोष था .
मेरी बेगम से ही वो खोलती थी ख्वाहिशों कि बात
सहमी बड़ी रहती थी मुझसे , था बुरा एहसास .
उम्र बेटी की मेरी ज्यों बढ़ती जाती थी .
ब्याह की चिंता मुझे मौला सताती थी .
साईकिल लेके बूढा मैं हर गली दर घुमा .
सुनकर दहेज की बात सर मेरा घुमा .
महीने भर जला के खून अपना जो पाता हूँ .
हज़ार सात रूपये में तो घर चलाता हूँ .
चपरासी मैं लाख रूपये कहाँ से लाता ?
सोच के ये बात मेरा , दिल था घबडाता .
दिन मेरे गुजर रहे थे मिन्नतें करते .
आस थी शायद किसी का भी दिल पिघले .
देख के मेरा यूँ झुकना औरों के सामने .
पूछती बेटी मेरी क्या जुर्म की थी बाप ने ?
फिर जुर्म से बाप को आजाद कर दिया .
मेरी बेटी ने आग में जल खाक कर दिया .
उसी आग को सिने मैं लेके दर दर जलता हूँ .
किसी के घर ना हो बेटी यही मौला से कहता हूँ .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
कहिया ले सहबु बहिन अईसन अत्याचार हो
टी.वी. मोटरसाईकिल खातिर लोग सब मरेला
फूल लेखां देहिया के तेल से जरावेला
सारा सुख छीनेला दहेज के बजार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
बेटिए के उजड़ेला घरवा दुअरवा
दुल्हन पर टूटेला विपति के पहाड़वा
गरभे में बेटिए के मरे संसार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
सोचअ बहिन सोचअ फुआ सोचअ बूढी माई
तहरे से भागी ई दहेजवा कसाई
झांसी के रानी बन ले ल अवतार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
“श्रीनाथ आशावादी” दरद सुनावेले
गऊंआ नगरिया में सबके बतावेले
जगीहें बहिनिया त होईहें उद्धार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
“श्रीनाथ आशावादी”
कहिया ले सहबु बहिन अईसन अत्याचार हो
टी.वी. मोटरसाईकिल खातिर लोग सब मरेला
फूल लेखां देहिया के तेल से जरावेला
सारा सुख छीनेला दहेज के बजार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
बेटिए के उजड़ेला घरवा दुअरवा
दुल्हन पर टूटेला विपति के पहाड़वा
गरभे में बेटिए के मरे संसार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
सोचअ बहिन सोचअ फुआ सोचअ बूढी माई
तहरे से भागी ई दहेजवा कसाई
झांसी के रानी बन ले ल अवतार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
“श्रीनाथ आशावादी” दरद सुनावेले
गऊंआ नगरिया में सबके बतावेले
जगीहें बहिनिया त होईहें उद्धार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
“श्रीनाथ आशावादी”
Tuesday, March 15, 2011
विडंबना
वो एक बेटी है
बेटी होने का नहीं जोश है .
और
बेटी जनमाने का
उसकी माँ को बड़ा रोष है
सच में
बेटी का बेटी
होने का अफ़सोस है .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
वो एक बेटी है
बेटी होने का नहीं जोश है .
और
बेटी जनमाने का
उसकी माँ को बड़ा रोष है
सच में
बेटी का बेटी
होने का अफ़सोस है .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
Wednesday, March 9, 2011
Saturday, March 5, 2011
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