Friday, April 22, 2011

मिलले शराबी सैयां

शेर : शराब के नशवे में झुमेला ई दुनिया

सब कुछ बरबाद भईल बुझे ना ई दुनिया
“आशावादी” कहे की अबहूँ से सोचअ तू
शराबी   के    घर घर   में रोए दुलहिनिया.


गीत: मिलले शराबी सैयां , इज्जत के नाश कईले
ए सखिया हे , सारा घर भईले बरबाद नु ए राम

नशवे में चूर रहस , गरिए से बात करस
ए सखिया हे, मीठी बोली खतिर मनवा तरसेला ए राम

गहना गुड़ियावा सब , खेते जायदाद बेचे
ए सखिया हे, गोदी के बालकवा कईसे जी ही नु ए राम


सावन भदउवा जईसे , बरसे नएनवा मोर
ए सखिया हे, आंखिया के लोरवा कभी ना सुखेला ए राम


कुहुकी कुहुकी चिरई , पिंजरा में रोवतारी
ए सखिया हे, पियवा के बोलिया गोलिया मरेला ए राम


“श्रीनाथ आशावादी” रोई रोई गीत लिखे
ए सखिया हे, कब होई बहुअन के उद्धार नु ए राम



“श्रीनाथ आशावादी”


Tuesday, April 19, 2011

भगवन तेरी एक लीला
























एक जंगली भैंस

एक जंगल में
आठ नौ भूखे जंगली सियार
एक सियार नोचता है
भैंस के एक थान को
दर्द से कराहती भैंस
दूसरा सियार फोड़ता है
दूसरे थान को
दर्द से चित्कारती भैंस
फिर टूट पड़ते हैं सारे सियार
नोचते,फोड़ते
थान से छेद बनाते , छेद बढ़ाते
दर्द से बिलबिलाती भैंस
बढ़ते जाते सियार
फाड़ते जाते सियार
गिर पड़ती है भैंस
देखती है आँख खोले
पुरे होश में
शरीर फटते हुए
खून निकलते हुए
शरीर में सियारों को घुसते हुए
सियार लड़ते हैं
फाड़ते हैं पेट
झपटते हैं आपस में
नोचते हैं
अंतडियां निकालते हैं
लाड़ गिरातें हैं, चबातें हैं
मांस खातें हैं
घंटों-घंटों
चित्कारती है भैंस
पुकारती हैं भैंस
शायद तुझको भगवन


“बेनाम” इसमें तेरी गरिमा क्या है ?
भैंस के इस तरह मरने में तेरी महिमा क्या है ???




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Saturday, April 16, 2011

अपवाद




सड़कों पे चलती महिलाओं पे बुरी नजर डालते हो

याद आती नहीं ?
तुम्हारी भी बीबी , बहन हैं , क्या इनकी
फरियाद नहीं सताती ?


पर ये अगर सड़कों पे चलती महिलाओं पे लाईन मारते हैं
तो ध्यान मत दो , इनकी और बात है
उपदेश औरों पे लागु होने के लिए होते हैं
कानून है समाज का , और ये अपवाद हैं .




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी


समाज का हिस्सा




पापा सुरेश तो एक्जाम में फेल हो गया .

महेश को चीटिंग में जेल हो गया
गणेश स्कूल छोड़ने में रेल हो गया
और रमेश का इन सबसे मेल को गया
और आप पूछते हैं मेरा रिजल्ट
क्या मैं समाज का हिस्सा नहीं ?


अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी


काने को काना कहना

ये जो नगीना है

बड़ा सयाना है
देखो कि बांधे सर पे
केसरी बाना है
चलता है ऐसे जैसे
कोई वीर राणा है
सच में नगीना सिंह
बड़ा मरदाना है .


छोटा भी दुनिया में
बड़ा भी दुनिया में
ऊँच नीच जात पात
छुआ छुत दुनिया में

पर एक आँख से देखे सबकुछ
एक समान हीं माने सबकुछ
ऐसा मस्ताना है
भले हीं एक आंख का काना है
पर आना है बाना है
नगीना सिंह सच में
बड़ा वीर मरदाना है.


अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी





चार प्रोफेसनल्स के गोल

बॉस के जीवन का गोल

पैसा
बाई हुक ऑर बाई क्रुक.


तुम्हारे जीवन का गोल
पैसा
बट बाई हुक ओनली.


उसके जीवन का गोल
पैसा
विथ रेसपेक्टेड लाइफ स्टाइल.


और मेरे जीवन जीवन का गोल
ईश्वर
बट
पोस्टपोंडेड फार नेक्स्ट लाइफ .


अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी


Thursday, April 14, 2011

कुहुकेला धीया के करेजवा




कुहुकेला धीया के करेजवा , त आंखिया से लोरवा झड़े ए राम.

होत  भिनुसार  विदईया   में ,   सखिया सहेलिया   रोए    ए राम.


डोलिया दुअरिया लगईले कहारअ , पापी   ठाड़े   भईले ए राम.
सुसुकेली माई के गोदीया में , तनी ना अचरवा  छोड़े ए राम.

छुटल जाला   घर  नईहरवा , सहेलि या के संगवा छोहे ए राम.
याद पड़े भाई के दुलरवा आ , बाबूजी के नेहिया साले ए राम.

सुसुकत   डोली    में बईठे बहुरिया , कहरवा उठाई लेलस ए राम.
“आशावादी” लिखत में लोड़ झडे, हाथ से कलमिया रुके ए राम .



“श्रीनाथ आशावादी”


आकाशवाणी पटना से रमेश्वर गोप द्वारा प्रसारित एवं दैनिक हिंदुस्तान पत्र की समीक्षा में प्रसंशित






Wednesday, April 13, 2011

छोटहन सा बचवा सयान हो जाला





दो चार आखर पढके बेईमान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


लईकन के बचपन में एने ओने भागल.
तोतली आवाज इनके बड़ा नीक लागल.
उहे जवानी में नीम के जुबान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


बचवा  के   मन    में    रहे  ना एको पाप.
सपनों में गलती से कहे ना झूठो साच.
उहे  बढ़ला   पे झूठ के गतान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


लईका आउर   लईकी  के बचपन के साथ.
खेतवा में खेले कूदे डाल के हाथों में हाथ.
उहे  जवानी   में   छुवे त बदनाम हो जाला.
आ   छोटहन   सा    बचवा सयान हो जाला.


तुरंते        लड़े     आउर     तुरंते मान जावे.
भागे    लड़ाई     करे     फेनु      लगे    आवे.
उहे बढला पर बड़का अभिमान हो जाला.
आ छोटहन    सा   बचवा सयान हो जाला.


माँई बाबू से प्यार करे , करे परनाम .
अब देखीं दूर से हीं कईसे करे सलाम .
कि घरवा में जईसे मेहमान हो जाला .
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


जाति     आ     पाति     के बात ना माने.
धरम का   ह    देश का ह बात ना जाने.
बड़का में लोभ द्वेष के दोकान हो जाला.
आ छोटहन    सा    बचवा सयान हो जाला.


लईकन के प्रेम के धागा से लोग बांधल .
कि देवतो भी इनके पवित्रता के कायल .
उहे जवानी में झूठ के खदान हो जाला .
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.


दो चार आखर पढके बेईमान हो जाला.
आ छोटहन सा बचवा सयान हो जाला.



अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Saturday, April 9, 2011

ये पैसा हाय





















पैसे   के    पीछे     तू खुद     को इतना क्यूँ भगाए .

इस     पैसे      ने   देखो तुझको कैसे दिन दिखाए .


गद्दे    मखमली     घर    तेरे    पर  नींद तुझे सताए
नेट-मोबाइल   हाथों    में पर  , दोस्त नहीं घर आए.

बना  लिए   घर   इतने सारे , और कितने मकान.
पर    रहते     इनमे   तुम ऐसे , जैसे एक मेहमान .


फ्रिज    टी.   वी.     कार     आदि ,  भोगे सारे सुख .
लुटा    दिए    तुमने      सारे ,    इनपे पेट की भूख .


म्यूजिक सिस्टम अनगिनत पर गीत नहीं हैं भाते .
ह्रदय रोग    डाईबीटीज     आदि     तुम्हें बहुत सताते .


तेरे पैसे से    आते     मेवा   पर खाते नौकर चाकर .
और तुझे    टेबलेट    ईन्जेक्सन देते डाक्टर आकर .


तेरा   जीवन    उत्पीड़न चिंता ,गम दुःख और हाय.
बेनाम   हितैषी     तेरा     तुझको , सुझा    रहा उपाय .


ये पैसा हीं इनके पीछे , ये सब इसका हीं है काम,
हर लूँ तेरे दुःख सारे कि मुझको दे दो पैसे तमाम .




अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी














Friday, April 8, 2011

विधवा के चिठ्ठी



















दुखवा के    बतिया,     लिखत    बानी पतिया में,

लोरवा        गिरेला    दिन     रतिया        सहेलिया.
लगन देखि शादी भईल,पोथियो भी झूठ भईल,
धूल     में        सोहाग     मिल गईल रे सहेलिया.


मईलअ    कुचईल   जबअ , कपड़ा पहिनी जबअ,
लोग     कहे        हमरा         के फूहड़ रे सहेलिया.
साफ      सुथड      जब रहीं , लोग हँसें कही कही,
ई     त        अब       मन के   बिगडलस सहेलिया.


घर     आ       बहरवा       के , बिगडल लोगवा के,
बुरा       बाटे        हम        पे     निगहवा सहेलिया.
दुनिया     के रीति नीति , देखि देखि हम सोची,
मन       के       लगाम      टूटी    जाई रे सहेलिया.


गोतीनि-देयादिनी      के ,     अपना पिया के संगे,
देखि      जिया       ह्हरेला          हमरो      सहेलिया.
मन     के        पियास       जब , हमके सतावे तब,
कईसहूँ       ईज्जतअ         बचाइं         रे सहेलिया.


लाजवा    के बतिया हम, लिखी कईसे पतिया में,
दुनिया    के        मरमो       , ना   जननी सहेलिया.
जिनगी     के   आपन पोल , केतना दी हम खोल,
घर     में       कुतियो       के  ना मोल रे सहेलिया.


गोदवा     में      रहिते      जे , एकोगो बालकवा त,
ओकरे      में          मन        अझूरईती      सहेलिया.
बाकिर गोद बाटे सुनअ, सोची सोची सूखे खूनअ,
जिनगी       में       खाली    बा अन्हारे रे सहेलिया.


कुहुकी      कुहुकी      चिडई , पिंजरा   में जीयतारी,
व्याध     ई        समाज       गोली मारे रे सहेलिया.
पतिया       के       बात      माँई      से जनी कहिअ,
कही      दीहअ       बेटी       नीक बाटी रे सहेलिया.


अंखिया     के      लोरवा    त , लेपलस अक्षरवा के,
धीरज     धके       टोई       टोई ,     पडीह सहेलिया.
“श्रीनाथ आशावादी”       लिखत      में     लोर झरे,
विधवा       के      दरदअ       सुनावे      रे सहेलिया.



“श्रीनाथ आशावादी”