मैं एक बूढा हूँ रंजो गम का दामन हर दम सहता हूँ .
किसी के घर ना हो बेटी यही मौला से कहता हूँ .
मेरा आँगन था सुना पड़ा मुद्दत से उदासी थी
थी सुबह हर बंजर मेरी हर शाम बासी थी .
बड़ी मिन्नतें की घर में मैंने उजाले के वास्ते .
पीर , बाबा को गया , मौला के रास्ते .
बड़ी ख्वाहिशों के बाद मेरी बगिया भी चहकी थी .
खुदा तुमने बूढ़े के दामन में औलाद बख्शी थी .
हर सुबह की किरण नई पैगाम लाती थी .
मेरी बेटी आँगन में जब खिलखिलाती थी .
खुदा मेरे मुझे इस बात का बड़ा अफ़सोस था .
मेरी डाट से डरती थी इस बात का रोष था .
मेरी बेगम से ही वो खोलती थी ख्वाहिशों कि बात
सहमी बड़ी रहती थी मुझसे , था बुरा एहसास .
उम्र बेटी की मेरी ज्यों बढ़ती जाती थी .
ब्याह की चिंता मुझे मौला सताती थी .
साईकिल लेके बूढा मैं हर गली दर घुमा .
सुनकर दहेज की बात सर मेरा घुमा .
महीने भर जला के खून अपना जो पाता हूँ .
हज़ार सात रूपये में तो घर चलाता हूँ .
चपरासी मैं लाख रूपये कहाँ से लाता ?
सोच के ये बात मेरा , दिल था घबडाता .
दिन मेरे गुजर रहे थे मिन्नतें करते .
आस थी शायद किसी का भी दिल पिघले .
देख के मेरा यूँ झुकना औरों के सामने .
पूछती बेटी मेरी क्या जुर्म की थी बाप ने ?
फिर जुर्म से बाप को आजाद कर दिया .
मेरी बेटी ने आग में जल खाक कर दिया .
उसी आग को सिने मैं लेके दर दर जलता हूँ .
किसी के घर ना हो बेटी यही मौला से कहता हूँ .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
कहिया ले सहबु बहिन अईसन अत्याचार हो
टी.वी. मोटरसाईकिल खातिर लोग सब मरेला
फूल लेखां देहिया के तेल से जरावेला
सारा सुख छीनेला दहेज के बजार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
बेटिए के उजड़ेला घरवा दुअरवा
दुल्हन पर टूटेला विपति के पहाड़वा
गरभे में बेटिए के मरे संसार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
सोचअ बहिन सोचअ फुआ सोचअ बूढी माई
तहरे से भागी ई दहेजवा कसाई
झांसी के रानी बन ले ल अवतार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
“श्रीनाथ आशावादी” दरद सुनावेले
गऊंआ नगरिया में सबके बतावेले
जगीहें बहिनिया त होईहें उद्धार हो
घूँघट बीचे जरेली बहिनियाँ हमार हो
“श्रीनाथ आशावादी”
वो एक बेटी है
बेटी होने का नहीं जोश है .
और
बेटी जनमाने का
उसकी माँ को बड़ा रोष है
सच में
बेटी का बेटी
होने का अफ़सोस है .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
वो एक बेटी है
बेटी होने का नहीं जोश है .
और
बेटी जनमाने का
उसकी माँ को बड़ा रोष है
सच में
बेटी का बेटी
होने का अफ़सोस है .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
ख्वाहिश-ए-मंजिल है जायज़ बेनाम , मजा तो तब है .
लुत्फ़-ए सफर में असर हो , नशा-ए–मंजिल का .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
शर्माजी कहते है
पिंटू की माँ
जरा पानी लाना .
पति कहते है ,
अजी सुनती हो ,
मोजा कहाँ है ?
पिंटू कहता है ,
मम्मी मुझे टॉफी दिला दो .
और पड़ोसी कहते है ,
शर्माजी की बहु शालीन है .
वो बहु है ,
पत्नी है ,
मां है .
वो अनाम है ,
उसका कोई अपना नाम नही .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
पूछा शराबी से मैं
है गम तुझे किस बात का ,
डूबा हुआ है अब तक
तू किस ख्याल में .
ज़माने की चाल से
परेशां मैं उम्र भर ,
फसाँ हुआ था अबतक ,
मुश्किल जंजाल मैं .
ज़माने की बातें भी
कहाँ कभी सुलझी है ,
अपनी हीं बातों में
दुनियां ये उलझी है .
तलाशते तलाशते
जवाब इस दुनियाँ का ,
बन गया था अक्सर
खुद हीं सवाल मैं .
होश में भी होकर
क्या करती ये दुनियाँ ,
क्या कहती ये दुनियाँ
क्या सुनती ये दुनियाँ .
कभी औरों पे हँसती है
कभी अपनों पे रोती है
रहा इसके तरीकों से
मैं बवाल में.
कि होश में रहकर भी
करना क्या काम है ,
झूठी मुठी बातें हीं
करती आवाम हैं .
बेहोशी में यारों
मजा है जन्नत का .
छोड़ो भी फँसे हो क्यों
इस मायाजाल में .
तेरी बातें मेरे
समझ के नाकाबिल है ,
जाहिल से लोग मुझे
कहते फिर जाहिल है .
बेनाम एक अर्ज है
गर निभ गयी है दुश्मनी तो
छोड़ दो अब जैसे भी
हूँ खुश फिलहाल मैं .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी
श्रीनाथ आशावादी
रिक्शेवाले से लाला पूछा
चलोगे क्या फरीदाबाद .
उसने बोला झटाक से उठकर
बिल्कुल तैयार हूँ भाई साब.
मैं तैयार हूँ भाई साब
की सामान क्या है तेरे साथ ?
तोंद उठाकर लाला बोला
आया तो मैं खाली हाथ .
आया तो मैं खाली हाथ
की साथ मेरे घरवाली है .
और देख ले पीछे भैया
वो हथिनी मेरी साली है .
वो हथिनी मेरी साली है
कि क्या लोगे किराया ?
देख के तीनों लाला हाथी
रिक्शा भी चकराया.
रिक्शावाला बोला पहले
आजम लूँ अपनी ताकत .
दुबला पतला चिरकूट मैं तुम
तीनों के तीनों आफत .
तीनों के तीनों आफत पहले
बैठो तो इस रिक्शे पर
जोर लगा के देखूं मैं फिर
चल पाता है रिक्शा घर ?
चल पाता है रिक्शा घर
कि जब उसने जोर लगाया .
टूनटूनी कमर वजनी रिक्शा
चर चर चर चर चर्राया .
रिक्शा चर मर चर्राया
कि रोड ओमपुरी गाल
डगमग डगमग रिक्शा डोले
हुआ बहुत ही बुरा हाल.
हुआ बहुत ही बुरा हाल
कि लाला ने जोश जगाया .
ठम ठोक ठेल के रिक्शे ने
तो परबत भी झुठलाया .
परबत भी को झुठलाया
कि क्या लोगे पैसा बोलो ?
गस खाके बोला फिर रिक्शा
दे दो दस रूपये किलो .
दो दस रूपये किलो लाला
बोला समझा क्या सब्जी
मैं लाला इंसान हूँ भाई
साली और मेरी बीबी .
साली और मेरी बीबी
फिर बोला वो रिक्शेवाला .
ये तोंद नहीं मशीन है भैया
सबकुछ पचनेवाला .
सबकुछ पचनेवाला भाई
आलू बैगन टमाटर
कहाँ लिए डकार अभीतक
कटहल मुर्गे खाकर .
कटहल मुर्गे खाकर कि
सरकारी अजब किराया है .
शेखचिल्ली के रूपये दस
और दस हाथी का भी भाड़ा है ?
अँधेरी है नगरी भैया
और चौपट करार है.
एक तराजू हाथी,चीलर
तौले ये सरकार है .
एक आंख से देखे तौले
सबको अजब बीमार है .
इसी पोलिसी का अ़ब तक
रिक्शेवाला शिकार है .
अजय अमिताभ सुमन
उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी