कविता करने से कौन रोक रहा है यार । कविता लिखने का तुझे पुरा है आधिकार । ये भी है ठीक कि तेरे भीतर का कलाकार । जग रहा है ये जगना भी मुझे है स्वीकार । गिला बस इस बात का कि अंदरूनी कलाकार । कर रहा है बार बार , बार बार और लगातार । कविता कि आत्मा का ऐसा बलात्कार । जैसे कि रीन की सफेदी की चमकार । हर बार , बार बार , बार बार और लगातार ।
प्रॉब्लम इस बात में नही है कि वो बड़ा आदमी है , प्रॉब्लम इस बात में है की वो अपने आप को बड़ा आदमी समझता है ।
प्रॉब्लम इस बात में नही है कि वो अपने आप को बड़ा आदमी समझता है , प्रॉब्लम इस बात में है कि वो जितना बड़ा आदमी है , अपने आपको उससे बड़ा आदमी समझता है ।
प्रॉब्लम इस बात में भी नही है कि वो जितना बड़ा आदमी है , अपने आपको वो उससे बड़ा समझता है । प्रॉब्लम इस बात में है कि अपने आपको जितना बड़ा आदमी समझता है उससे अपने आपको ज्यादा बड़ा आदमी दिखाता है ।
प्रॉब्लम इस बात में भी नही है कि वो अपने आपको ज्यादा बड़ा दिखाता है , प्रॉब्लम दरअसल इस बात में है कि वो जो कुछ भी दिखाता है , मुझे सब कुछ दीखता है ।
प्रॉब्लम इस बात में भी नही है कि वो जो कुछ भी दिखाता है मुझे सब कुछ दिखाता है , प्रॉब्लम दरअसल इस बात में है कि मुझे जो भी दिखाता है वो सब मुझे खलता है ।