Thursday, January 29, 2009

इल्जाम

कड़कती ठंढ थी बड़ी , था दिसम्बर का महिना ।
घनेरी धुंध में मुश्किल , हुआ था ठीक से चलना ।

इसी दिल्ली की सर्दी में , जीने के वास्ते भाई ।
गया था मैं भी अपने , ऑफिस के रास्ते भाई ।

निकलता मुख से था धुआं व सिमटे हुए थे लोग ।
मेरे माथे पे थी टोपी , और सिने पे ओवरकोट ।

इसी कड़कती ठंढ में , देखा कोई था चिथड़े में ।
कुडे से लेके छिलके , केले के डाल जबड़े में ।

कुत्तों से कर रहा था छिना झपटी कुडे के वास्ते ।
खुदा तू ही बता में क्या लिखूं अब तेरे वास्ते ।

माना सबकुछ मिला मुझको तेरी इस दुनिया में ।
फ़िर भी शिकायत है मुझे , इस तेरी दुनिया से ।

उस इंसान का चेहरा सिने से उतरता नहीं ।
है बेहतर कुत्तों की हालत , उस इंसान से कहीं ।

क्यूँ कर नसीबों वाले ऐसे इस जहाँ में है आते ।
खुदा में दे रहा इल्जाम इन अभागों के वास्ते ।



बेनाम कोहडाबाजारी
उर्फ़
अजय अमिताभ सुमन

Tuesday, January 27, 2009

हाय रे टेलीफोन

टिकट के वास्ते सिनेमाहाल को , लगाया मैंने फ़ोन ।
बजी घंटी ट्रिंग ट्रिंग तो पूछा है भाई कौन ।

पूछा है भाई कौन कि तीन सीट क्या खाली है ।
मैं हूँ मेरी बीबी है और साथ में साली है ।

उसने कहा तीन सीट कि क्या करते है हिसाब ।
पुरी जगह ही खाली है, सपरिवार आइये जनाब ।

मैंने पूछा किस जगह से बोल रहे हो श्रीमान ।
उसने कहा मैं भुत हूँ , घर मेरा शमशान ।

हाय रे टेलीफोन , ये कैसी तेरी माया ।
देखना था चलचित्र , तुने शमशान पहुँचाया ।

बेनाम कोंहड़ाबाजारी
उर्फ़
अजय अमिताभ सुमन

Sunday, January 25, 2009

फितरते इंसान

फ़ितरते इन्सान , ना समझे बेनाम
ये सोचता कुछ और , कहता कुछ और , और करता कुछ और ।



बेनाम कोह्डाबाजारी
उर्फ़्
अजय अमिताभ सुमन

Friday, January 23, 2009

बुरा एहसास

बुरा लगा था मुझे
बचपन में
मेरा अपनी क्लास में आना चतुर्थ
और
मेरी बहन का प्रथम आना ।

एक बार फ़िर बुरा लगा है मुझे
मेरा बन जाना इंजिनियर
और
मेरी बहन का
उसकी ससुराल में चूल्हे बर्तन धोना ।

बेनाम कोहडाबाजारी
उर्फ़
अजय अमिताभ सुमन

Tuesday, January 20, 2009

मेरी परिभाषा

प्यार करोगे
तो प्रेमी हूँ ,
गर दुलार
तो स्नेही हूँ ।

हताश हूँ
फटकार पे ,
निराश हूँ
दुत्कार पे ।

उपहास से हूँ
क्लेशग्रस्त ,
और परिहास से
द्वेषत्रस्त ।

नफरत
तिरस्कार का ,
इबादत
उपकार का ।

अनादर पे
रोष हूँ मैं ,
प्रसंशा पे
मदहोश हूँ मैं ।

हार का
संताप हूँ ,
जीत की
उल्लास हूँ ।

सम्मान हूँ
जहाँ आदर है ,
अभिमान हूँ
जहाँ सादर है ।

भरोसे का
विश्वास हूँ मैं ,
उत्साही की
आस हूँ मैं ।

भावों के संसार निरंतर
और इनके संप्रेषण ,
कर रहा परिलक्षित हूँ मैं
एक प्रतिबिंबित दर्पण ।


बेनाम कोहडाबाजारी
उर्फ़
अजय अमिताभ सुमन

Saturday, January 17, 2009

लव कॉमपेन

फंसी जीवन की नैया मेरी , बीच मझधार की तरह ।
तू दे दे सहारा मुझको , बन पतवार की तरह ।

तेरी पलकों की मैंने जो , छांव पायी है ।
मेरी सुखी सी बगिया में, हरियाली छाई है ।
तेरा ये हंसना है या की , रुनझुन रुनझुन ।
खनखनाना कोई , वोटों की झंकार की तरह ।

तेरे आगोश में ही , रहने की चाहत है ।
तेरे मेघ से बालों ने, किया मुझे आहत है ।
मेजोरिटी कौम की हो तुम , तो इसमे मेरा क्या दोष।
ये इश्क नही मेरा , पॉलिटिकल हथियार की तरह ।

हर पॉँच साल पे नही , हर रोज वापस आऊंगा ।
तेरी नजरों के सामने हीं, ये जीवन बिताउंगा ।
अगर कहता हूँ कुछ तो , निभाउंगा सच में हीं ।
समझो न मेरा वादा , चुनावी प्रचार की तरह ।

जबसे तेरे हुस्न की , एक झलक पाई है ।
नही और हासिल करने की , ख्वाहिश बाकी है ।
अब बस भी करो ये रखना दुरी मुझसे ।
जैसे जनता से जनता की सरकार की तरह ।

प्रिये कह के तो देख , कुछ भी कर जाउंगा ।
ओमपुरी सड़क को , हेमा माफिक बनवाऊंगा ।
अब छोड़ भी दो यूँ , चलाना अपनी जुबां ।
विपक्षी नेता का संसद में तलवार की तरह ।

चेंज की है पार्टी तो, तुझको क्यों रंज है ।
पोलिटीकल गलियों के, होते रास्ते तंग है ।
चेंज की है पार्टी , पर तुझको न बदलूँगा।
छोडो भी शक करना , किसी पत्रकार की तरह ।

बड़ी मुश्किल से गढा ये बंधन , इसे बनाये रखना ।
पॉलिटिकल अपोनेनटो से , इसे बचाये रखना ।
बस फेविकोल से गोंद की , तलाश है ऐ भगवन।
की टूटे न रिश्ता अपना , मिली जुली सरकार की तरह ।

फसी जीवन की नैया मेरी , बीच मझधार की तरह ।
तू दे दे सहारा मुझको , बन पतवार की तरह ।

बेनाम कोंहराबाजारी
उर्फ़
अजय अमिताभ सुमन

Tuesday, January 13, 2009

जरुरत

उसने करके खबरदार , मारा बेनाम को ।
बेईमानी में इमान की जरुरत कुछ कम नही ।


बेनाम कोह्डाबाजारी
उर्फ़्
अजय् अमिताभ सुमन

Saturday, January 10, 2009

हकीकत

हम सोच के बड़ा ये खुशगवार हो चले थे ।
बड़ी थी खुशफहमी , शिकार हो चले थे ।
मशरूफ जगह जीने कि, मुझको है मयस्सर ।
ये मान के बेफिक्र हम , हज़ार हो चले थे ।

छोटी छोटी हारों से दुखता था मेरा मन ।
छोटी छोटी बातों से टूटता था मेरा मन ।
छोटे तरीकों से , जीता जान लोगों से ।
खुदा का हज़ार शुक्रगुजार हो चले थे ।

ये जनता था नाम में , रखा कुछ भी नही ।
ये मानता था मान में , रखा कुछ भी नही ।
पर जीवन ये मेरा कि , नाम और शान पे ।
ख़ुद से खुश- नाराज , कई बार हो चले थे ।

मालूम न था गम के साये मुझपे भी छाएंगे ।
दुःख के बादल के छाये , मुझपे भी आएँगे ।
औरों को देखा रोते तो , खोली आँख थोडी ।
कि रोते लोगों से , दरकिनार हो चले थे ।

ये बीबी ये बच्चे , ये घर बार ये सपना ।
जाने किस किस को , समझा था मैं अपना ।
पर मौत के बिछावन से हुआ जब रु ब रु ।
ख़ुद ही ख़ुद से हम लाचार हो चले थे ।

देखता हूँ आंखों से , आँख पर नहीं हूँ मैं ।
सोंचता हूँ सांसों पे , नाक पर नही हूँ मैं ।
शरीर ने आख़िर में, छोड़ा जब ख़ुद का साथ।
बड़ी देर से इस सच के , दीदार हो चले थे ।



अजय अमिताभ सुमन

उर्फ
बेनाम कोहड़ाबाज़ारी

Thursday, January 8, 2009

सवालात

यहाँ कत्ल नही देखते , देखे जाते इरादे।
कानून की किताबों के , अल्फाज ही कुछ ऐसे हैं ।


बेखौफ घुमती है , कातिल तो मैं भी क्या करुँ ।
अदालत की जुबानी , बयानात ही कुछ ऐसे हैं ।

हर तारीख दर तारीख पे , देते हैं तारीख बस।
इंसाफ के रखवालों के , सौगात हीं कुछ ऐसे हैं ।

हम आह भी भरते है , तो ठोकती है जुरमाना।
इस देश की कानून के , खैरात ही कुछ ऐसे है।

फाइलों पे धुल पड़ी , चाटती हैं दीमक ।
कानून के रखवालों के , तहकीकात ही कुछ ऐसे है।

उछालते हैं शौक से , हर एक के जनाजे को ।
शहर के रखवालों के , जज्बात ही कुछ ऐसे हैं ।

आते हैं फैसले फरियादी की मौत के बाद ।
की फैसलेदारों के , इन्साफ ही कुछ ऐसे हैं ।

फरियाद अपनी लेके , बेनाम अब जाए किधर ।
अल्लाह भी बेजुबां है , सवालात हीं कुछ ऐसे हैं ।


बेनाम कोहडाबाजारी
उर्फ़
अजय अमिताभ सुमन

फितरत

जाके कोई क्या पूछे भी , आदमियत के रास्ते ।
क्या पता किन किन हालातों से गुजरता आदमी ।

चुने किसको हसरतों , जरूरतों के दरमियाँ ।
एक को कसता है तो , दूजे से पिसता आदमी ।

चलता कहाँ जोर ख़ुद की , आदतों पे आदमी का ।
कसने की कोशिश बहुत है , और बिखरता आदमी ।

गलतियाँ करना है फितरत , करता है आदतन ।
और सबक ये सीखना , कि दोहराता है आदमी ।

आदमी है एक प्यासा , और जीवन एक मरुभूमि ।
की दीखता है नीर उसको , पर तरसता आदमी ।

झूठे सच्चे ख्वाबों का , एक पुलिंदा महज है ये ।
एक से बिखरता है , दूजा संवारता आदमी ।

मानता है ख्वाब दुनिया , जानता है ख्वाब दुनिया ।
और टूटे फूटे ख्वाबों का , हिसाब करता आदमी ।

सपने रेतों के जैसे , हाथ से निकले बहुत जो ।
दूर फिसलते रहे , और पकड़ता आदमी ।

आदमी की हसरतों का , क्या बताऊँ दास्ताँ।
आग में जल खाक बनकर , राख मांगे आदमी ।

बेनाम कोहडाबाजारी

उर्फ़
अजय अमिताभ सुमन